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Friday, 12 August 2016

दुष्यंत कुमार की शायरी: हिन्दी नहीं हिंदुस्तान की गजलें

दुष्यन्त कुमार हिन्दी कवियों में एक ऐसा नाम है जिसे हिन्दी ग़ज़ल का प्रवर्तक माना जाता है। दुष्यन्त कुमार के विषय में अगर कहा जाए कि उन्होने हिन्दी रचनाकारों के लिए हिन्दी में ग़ज़ल का एक रास्ता खोला तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैसे हिन्दी ग़ज़ल की एक सामान्य परिभाषा देना कठिन कार्य है। क्योंकि यदि छंद के दृष्टिकोण से देखें तो हिन्दी ग़ज़ल में हिन्दी छंद का प्रयोग एवं हिन्दी छंद शास्त्र के नियमों का पालन होना चाहिए, अर्थात् मात्राओं की गणना ध्वनि के आधार पर नहीं अपितु प्रयोग किए गए शब्द के वास्तविक वजन के आधार पर होनी चाहिए। और यदि भाषा एवं शब्द चयन कि दृष्टि से देखें तो हिन्दी शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों का गहन अध्ययन किया जाए तो उन्होने उपर्युक्त दोनों नियमों का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया। उन्होंने अपनी ग़ज़लें उर्दू बहरों में लिखी और हिन्दी शब्दों के साथ उर्दू शब्दों का भी जमकर प्रयोग किया। परंतु इस सब के बाद दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों का महत्व कम नहीं हो जाता। एक आम आदमी की जुबान बनकर दुष्यन्त ने जिस पीड़ा को कलमबद्ध किया वह कोई आसान काम नहीं था। भाषा के बारे में वो कितने ईमानदार थे यह तो उनकी साए में धूप पर लिखी भूमिका से ही पता चलता है। उन्होने स्पष्ट किया मैं उस भाषा में लिखता हूं जिसे मैं बोलता हूं, जब हिन्दी और उर्दू अपने अपने सिहांसन से उतरकर आम आदमी के पास आती हैं तो इनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें पढ़कर ऐसा लगता है कि वो हिन्दी से कहीं ज्यादा हिन्दुस्तान की ग़ज़लें है। जिनमें उस समय के आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष, एवं परिस्थितियों से जूझते रहने का चित्रण किया है। अपने अशआर में बारूद भरकर दुष्यन्त कुमार ने शायरी के एक ऐसे स्वरूप को दिखाया जिससे हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल का एक नया रूप प्रकट हुआ। जिसे कहीं लचर छंद विधान के आधार पर अस्वीकार किया गया तो कहीं उसकी बेबाकी को सलाम ठोंका गया। लेकिन दुष्यन्त कहीं किसी भी आलोचना की परवाह नहीं की उनका सारा संघर्ष उनकी शायरी में प्रतिबिंबित हुआ है वो एक जगह लिखते हैं


कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिराहने लगा के बैठ गए

वह बेबसी एवं अभाव को भी आशावादी स्वर देते हैं


न होगा कमीज तो पावों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं सफर के लिए

उनकी पीड़ा में हर किसी की पीड़ा झलकती है। झूठ फरेब, धोखाधड़ी, भौतिकवाद को उन्होने अपनी ग़ज़लों में अनेक जगह प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। जिसके कुछ सटीक उदाहरण हैं ये शेर


जरा सा तौर तरीकों में हेर फेर करो,
तुम्हारे हाथ में कॉलर हो आस्तीन नहीं

परंतु दुष्यन्त कुमार का मुख्य स्वर दहशत से भरे समाज का चित्रांकन करना रहा उन्हें आजादी की वो आबो हवा रास नहीं आई. बहुत गुस्से में उन्होंने लिखा


यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा
इस शहर में अब कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

दुष्यन्त देश की तत्कालीन परिस्थितियों से बहुत नाराज थे। और यह बात उन्होने प्रखर स्वर में कही


आप आएं बडे शौक से आएं यहां
ये मुल्क देखने लायक तो है हसीन नहीं
कल नुमाइश में मिला वो चीथडे पहने हुए
मैने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

दुष्यन्त कुमार ने ऐसी ही स्थितियों का आईना बनने की हमेशा कोशिश भी की और अपने अक्खड़पन को मूर्त रूप भी दिया। उनकी नाराजगी इन शेरों में स्पष्ट जाहिर होती है


हालाते जिस्म सूरते जां और भी खराब
चारों तरफ खराब यहां और भी खराब
खंडहर बचे हुए हैं इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही

एक शायर के रूप में दुष्यन्त अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे समाज को जागृति प्रदान करने के लिए भी उनकी लेखनी सदैव ज्वलन शील रही। उन्होने भले ही निराशा एवं क्रोध का अधिकाधिक चित्रण किया लेकिन अंतत: उनका स्वर आशावादी ही रहा। यह उनकी हुंकार थी


हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

दरख्तों के साए में भी धूप झेलते हुए दुष्यन्त कुमार ने हर तरह का कटु सत्य जनमानस में प्रवाहित किया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसा अद्भुत शायर न तो कभी हुआ और भविष्य में शायद ही कभी हो। हिन्दी कविताओं में कबीर के बाद इतना अक्खड़पन केवल दुष्यन्त कुमार की ही रचनाओं में उभरकर सामने आया। दुष्यन्त का अंदाजे बयां सबसे जुदा था। वास्तव में यह हिन्दी पाठकों का सौभाग्य है कि उन्हें दुष्यन्त को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी समस्त साहित्यिक सोच एवं संघर्ष शायद इसी शेर से प्रकट होता है।


दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा जरूर
हर हथेली खून से तर और ज्यादा बेकरार

आइए इसी असर के लिए दुआ करें हम भी, दुष्यन्त को नमन करते हुए।

Tuesday, 17 March 2009

हिन्दी भाषा का वर्तमान एवं भविष्य : एक व्यावहारिक विवेचन

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हिन्दी भाषा के विषय में किस दृष्टिकोण से बात की जाए प्रथम तो यह निर्धारित करना आवश्यक है. पहला दृष्टिकोण एक सामान्य हिन्दी कवि पत्रकार, या लेखक वाला हो सकता है जिसके प्रभाव में "हिन्दी हमारी मातृभाषा है", "हिन्दी अपनाओ" , और "निज भाषा उन्नति अहै" जैसे वाक्यांश सुने और पढ़े जाते हैं. तथा हिन्दी दिवस एवं हिन्दी पखवाडा आदि मनाये जाते हैं. दूसरा दृष्टिकोण एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है . प्रबंध का विद्यार्थी होने के कारण मेरा विचार उन सभी लेखों से अलग है जो हिन्दी भाषा के विषय में अक्सर पढ़े जाते हैं. प्रबंध स्थिति को समझने एवं उचित निर्णय लेने का सर्वश्रेठ मार्ग प्रशस्त करता है . और सर्वश्रेठ मार्ग कभी भी अव्यावहारिक नही हो सकता . पहला दृष्टिकोण कहता है कि लोग हिन्दी सीखें, उन्हें हिन्दी सिखाई जाए क्योंकि यह हमारी मातृभाषा है . परन्तु दूसरा दृष्टिकोण इसके ठीक विपरीत है . इसके अनुसार ऐसा वातावरण बने कि लोग स्वयं हिन्दी सीखने के लिए आगे आएं और उसके लिए एक व्यवहारिक कारण हो न कि कोई भावनात्मक तर्क . कोई भी व्यक्ति इस प्रकार हिन्दी सीखने के लालायित होना चाहिए जिस प्रकार अंग्रेज़ी सीखने के लिए आज विद्यार्थियों कि भीड़ कि भीड़ दौड़ रही है.
बहुत पहले हिन्दी दिवस पर एक समाचार पत्र में एक लेख का शीर्षक पढ़ा कि सरकार ने हिन्दी को कभी रोज़गार कि भाषा बनाने का प्रयास नहीं किया. वास्तव में यही तथ्य है जो व्यावहारिकता कि और संकेत करता है . आज भारतीय सामुहिक जगत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्थापित होने के कारण जिस गति से लोग अंग्रेजी कि तरफ़ भाग रहे हैं उससे तो ऐसा लगता है कि हिन्दी बहुत जल्द संस्कृत की तरह मंत्रों और सूक्तियों कि भाषा हो कर रह जायेगी और द्रुत गति से बढती हुई अंग्रेजी भारत में भी आम बोल-चाल कि भाषा बन जायेगी.

वर्तमान स्थिति यह है कि आज बड़े बड़े प्रतिष्ठित विश्वविद्यलयों में हिन्दी में स्नातकोत्तर विषय में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थी कम हैं और स्थान ज्यादा. अर्थात हर वर्ष स्थान रिक्त रह जाते हैं. वहीं दूसरी और अंग्रेजी के लिए छोटे छोटे शिक्षा केन्द्रों में भी विद्यार्थियों की भीड़ की भीड़ दिखाई देती है. अमेरिकन, ऑक्सफोर्ड, ब्रिटिश आदि नामों से अनेक दुकाननुमा लाखों संस्थान पूरे देश में अंग्रेजी सिखा रहे हैं . और इनकी मांग बढती ही जा रही है. इस प्रकार के संस्थान आजकल न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपना स्थान बना रहे हैं अपितु सफलता भी प्राप्त कर रहे हैं . इनके विज्ञापन अक्सर हिन्दी में होते हैं ताकि आम आदमी भी इन्हे समझ सके . इनको देखकर तो कभी कभी लगता है कि स्वयं हिन्दी भाषा अंग्रेजी भाषा का प्रचार कर रही है.
समय को यदि आज एक बिन्दु पर रोककर देखा जाए तो 'वर्तमान स्थिति' इतनी भयानक नहीं है परन्तु भविष्य कि कल्पना मात्र से ही मन हिन्दी भाषा के प्रति आतंकित हो उठता है पिछले दिनों दिल्ली में ही विद्या भारती के एक विद्यालय में जाना हुआ. वहां की प्राचार्या महोदया से मैंने हिन्दी मध्यम में पढने वाले विद्यार्थियों कि कक्षाओं कि संख्या के विषय में प्रश्न किया . उन्होंने बताया कि हमारे विद्यालय में केवल एक कक्षा हिन्दी माध्यम में है और वो भी मेरे विशेष प्रयासों से बची हुई है, क्योंकि महानगर के विद्यालयों में हिन्दी माध्यम में शिक्षा प्रदान कर बहुत अधिक समय तक विद्यालय चलाना कोई आसान कार्य नहीं है
आज महानगरों में ही नही अपितु कस्बों और गावों में भी लोग बच्चों को अंग्रेजी मध्यम के विद्यालयों में पढाना पसंद करते हैं अंग्रेजी बोलना गर्व कि बात हो गई है और हिन्दी बोलना शर्म की . परन्तु कटु सत्य भी यही है कि अंग्रेजी भाषा के मध्यम से लोगों को रोजगार कि अनंत संभावनाएं प्राप्त हुई हैं . मात्र अंग्रेजी भाषा में संवाद करने के लिए यदि कोई किसी बेरोजगार युवा को दस से बीस हज़ार रुपए प्रतिमाह दे तो वह व्यक्ति क्यो अंग्रेजी नहीं सीखेगा . इस प्रकार के अवसर कॉल सेण्टर (बी पी ओ ) व्यवसाय आसानी से उपलब्ध करा रहा है और युवक-युवतियां सहज ही इसकी तरफ़ आकर्षित हो रहें हैं. हिन्दी में इस प्रकार की संभावनाएं बहुत कम हैं या ये कहें कि न के बराबर हैं . व्यावसायिक शिक्षा का माध्यम मात्र अंग्रेजी भाषा हो गई है एम् बी ऐ , एम् सी ऐ , बी टेक ही नही व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा का शायद ही कोई और क्षेत्र हो जिसे हिन्दी में पढाया जा रहा हो .
संप्रेषण कौशल का अर्थ भी आज अंग्रेजी ही हो गया है नियुक्ति के लिए समूह चर्चा एवं साक्षात्कार में हिन्दी का एक भी शब्द प्रयोग करने वालों को कई बार तो तुंरत प्रभाव से अचयनित कर दिया जाता है. हिन्दी बोलने वालों को अनपढ़ और अंग्रेजी बोलने वालों को पढ़ा लिखा समझा जाना कोई नई बात नहीं है
कभी कभी तो ऐसा लगता है की हिन्दी भाषा लुप्त होती जा रही है . प्रबंध में प्रवक्ता होने के साथ साथ मेरे हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा के बारे में अनेक अनुभव हैं किसी विषय को लेकर एक बार मैंने एक बार एक विश्वविद्यालय में दूरभाष से संपर्क किया और हिन्दी में बोलना प्रारम्भ किया तो सुनने वाले ने तुंरत कहा "वाई डोंट यू स्पीक इन इंग्लिश" अर्थात आप अंग्रेजी में क्यों नही बोलते . भारतीय प्रबंध संस्थान, केरला में भी अनुभव कुछ इसी प्रकार का रहा . अब तो स्थिति यहाँ तक आ गई है की बहुत से विद्यालयों में अंग्रेज़ी बोलने पर प्रतिबन्ध है , यहाँ तक कि जुर्माना एवं दंड का प्रावधान भी है शिक्षा व्यवस्था में भी हिन्दी को किसी भी कक्षा में पढ़ना अनिवार्य नहीं है . इसलिए बहुत से विद्यार्थी इस विषय का चयन ही नही करते . हिन्दी भाषी क्षेत्रों के अलावा अन्य राज्यों के बहुत से विद्यार्थी हिन्दी बोलना, लिखना और पढ़ना नहीं जानते.
ऐसा नहीं है कि आज हिन्दी के विकास में कोई काम नहीं हो रहा या हिन्दी बिल्कुल भी सीखी और पढ़ी नही जा रही . आज अंतरजाल (इन्टरनेट) पर अनेक हिन्दी वेबसाइट उपलब्ध हैं जिनमे समाचार, कवितायें एवं लेख पर्याप्त मात्र में पढ़े जा सकते हैं, आज विदेशी भी हिन्दी भाषा सीख रहें हैं . भारत में भी एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो जानता, पढता और समझता ही नहीं अपितु प्रयोग भी करता है . परन्तु विषय वर्तमान स्थिति का तो है ही नही, विषय तो भविष्य का है . और चिंता यह है कि अंग्रेजी की वृद्धि दर हिन्दी की वृद्धि दर से काफ़ी अधिक है
अब यह सोचना जरूरी है की हम हिन्दी भाषा के लिए क्या कर सकते हैं क्योंकि हर व्यक्ति के मन में एक बात निशित रूप से जम गई है कि बिना हिन्दी तो हम गुजरा कर सकते हैं परन्तु आज के इस प्रतियोगी युग में बिना अंग्रेजी के जीना सम्भव नहीं है . और कहीं कहीं यह सत्य भी प्रतीत होता है एक इसी सोच ने हिन्दी भाषा के विस्तार एवं विकास पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है जब किसी का काम एक भाषा से चलेगा तो वह दूसरी भाषा क्यों सीखेगा .

हिन्दी के वर्तमान एवं भविष्य पर ये चर्चा व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित रही है लेकिन इसके समाधान के लिए हमें दोनों प्रकार के दृष्टिकोण अपनाने होंगे हम हिन्दी भाषा से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं . हमें साहस के साथ साथ कुछ दुस्साहस की भी आवश्यकता है . यदि हम वर्तमान में हर स्थिति को ध्यानार्थ रख कर सोचें तो कुछ समाधान हमें आज भी दृष्टिगोचर होते हैं हिन्दी यदि रोज़गार कि भाषा बन जाए तो इस विषय में चिंता करने कि जरूरत ही नहीं पड़ेगी . यदि हिन्दी भाषा में शिक्षण प्राप्त युवा को अन्य युवाओं के समान आय के अवसर प्राप्त हो जाएँ, और भारतीय सामूहिक जगत भारत के दिल कि धड़कन हिन्दी भाषा कि महत्ता समझे तो हिन्दी भाषा को भारत में जन जन कि भाषा का सम्मान दिलाना सम्भव है . अंग्रेजी के प्रतिष्ठित व्यावसायिक समाचार पत्र इकनॉमिक टाईम्स का हिन्दी में प्रकाशित होना इसका ज्वलंत उदहारण है . इससे सिद्ध होता है कि व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा भी हिन्दी में प्राप्त कि जा सकती है . प्रथम तो 'भारतीय' सामूहिक जगत कि कम्पनियां आगे आएं तथा भाषा के भेद को छोड़कर ज्ञान के आधार पर रोज़गार प्रदान करें . ऐसे शिक्षण संसथान खुलें जो हिन्दी में व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करें तथा ऐसे युवा भी आगे आएं जो वह शिक्षा प्राप्त करें. भारत के हर नागरीक को आज यह महसूस करने कि आवशयकता है कि हम चाहे कितनी भी भाषाएँ सीखें परंतु हमें हिन्दी पढ़ना लिखना और बोलना अवश्य आना चाहिए . सभी भाषाएँ माँ समान हैं परंतु हिन्दी अपनी माँ है.
अब यही कहना चाहूँगा :

हर शब्द अटल निर्माण करे
नव युग की आशा हो हिन्दी
हर मन की भाषा हो हिन्दी
जन जन की भाषा हो हिन्दी

Friday, 28 November 2008

हिन्दी पद्य साहित्य में नारी : वर्तमान परिप्रेक्ष्य

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफला: क्रिया।


नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में,
पीयूष स्रोत सी बहा करो,जीवन के सुंदर समतल में

उपरोक्त हिन्दी एवं संस्कृत की अति प्रसिद्ध काव्योक्तियां न केवल नारी की पवित्रता एवं सम्मान को दर्शाती हैं, अपितु यह संकेत भी करती हैं कि जीवन के सुंदर समतल में अमृतसम बहने वाली नारी एक विश्वास के बंधन के साथ साथ कितनी कर्तव्यपरायण भी हैं। पुरातन साहित्य की इन पंक्तियों अनुवादित करते हुए मुख्य विषय यह है कि आज रचा जाने वाला पद्य साहित्य जिस पर निराला की साहित्यिक निष्ठा से लेकर उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमण्डलीकरण तक का प्रभाव है, ने नारी की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता, उच्छृंखलता एवं कर्मक्षेत्र में योद्धा की भांति लड़ने वाली प्रवृत्ति को किस रूप में दिखाया है। आधुनिक हिन्दी पद्य साहित्य में नारी के लिए पर्याप्त स्थान है। परंतु जैसे-जैसे समाज में नारी ने अपना रूप बदला है। वैसे-वैसे साहित्यकारों ने उसका पीछा किया है। और साहित्य ने कम से कम इस विषय में तो, अर्थात् नारी को प्रस्तुत करते हुए समाज के दर्पण के रूप में काम किया है। साहित्य ने नारी को मुख्यत: चार रूपों मे दिखाया है। प्रथम रूप वह है जिसमें उसे देवी मानकर पूजा जाता है। ऐसी आधुनिक नारी की छवि यूं तो देखने में कम ही मिलती है। परंतु साहित्यकारों में अब भी वह सकारात्मकता है कि वो नारी को नमन करते हैं। एक युवा कवि कि कुछ पंक्तियां इस विषय में प्रस्तुत हैं

नारी पूजा, नारी करुणा, नारी ममता, नारी ज्ञान
नारी आदर्शों का बंधन, नारी रूप रस खान
नारी ही आभा समाज की, नारी ही युग का अभिमान
वर्षों से वर्णित ग्रंथों में नारी की महिमा का गान


डॉ कुंवर बेचैन की पंक्तियां नमन कराती हैं सीमा पर जाते हुए एक जवान के द्वारा अपनी बहन के स्नेह को

रेशमी रक्षा कवच राखी के धागों को नमन

औरत का दूसरा रूप जिसमे उसे वर्तमान साहित्य में सर्वश्रेष्ठ भूमिका में दिखाया गया है। वह एक ऐसा रूप है जिसमें आधुनिक महिला समाज के लिए एक आदर्श है। वह एक मां, बहन, पत्नी एवं बेटी सभी रूपों में सफल है। यह वह रूप है जिसमें आधुनिक नारी घर में सभी भूमिकाओं का सफलता से निर्वाह करती है। घर में उसके त्याग पर गुलशन मदान लिखते हैं

पुरुष वह लिख नहीं सकता कभी भी
लिखा नारी ने जो इतिहास घर में


प्रसिद्ध शायर निदा फाजली ने मां का वर्णन करते हुए कुछ ऐसी पंक्तियां लिखी हैं जिनमें नारी की सरलता का अदभुत रूप देखने को मिलता है।

बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बासन चिमटा फूंकनी जैसी मां
बांट के अपना चेहरा माथा, आंखें जाने कहां गई
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी मां

डॉ सारस्वत मोहन मनीषी ने बड़ी ही सहजता से मां का वर्णन किया है

बंजर में मधुमास हुआ करती है मां
खुश्बू का अहसास हुआ करती है मां


कवि गोपालाचार्य ने बहुत ही विनम्र भाव से लिखा है

पत्नी घर की आन है, आंगन की है धूप
रिश्ता है विश्वास का, पूरक रूप अनूप


आधुनिक महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है। और उसका परिवार की आर्थिक समृद्धि में भी भरपूर योगदान है। वर्तमान साहित्य इस पर भी कडी नजर रखता हुआ प्रतीत होता है-

अध्यापिका बनी है नारी ज्ञान बांटती वह फिरती है
बड़े बड़े उद्योग चलाती, अपने निर्णय खुद करती है


नारी का तीसरा रूप एक ऐसा रूप है जिस पर कवियों की लेखनी हर युग में सबसे अधिक चलती आई है, न जाने वह कौन सा समय था जब स्त्री को अबला की उपाधि मिल गई और वह उससे ऐसी चिपकी कि आज तक वह इससे नहीं उबर पाई। हालांकि यह भी सत्य है कि आज समाज में महिला उत्पीड़न के ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि सारा समाज शर्मशार हो जाता है। आधुनिक कवि इस दर्द पर जन मानस को जागृत करने मे पीछे नहीं हैं। भ्रूण हत्या की मानसिकता पर कवि योगेन्द्र मौदगिल का शेर-

नहीं चाहिए मुझको पोती
दादी का फरमान हो गया

दहेज प्रथा पर वह लिखते हैं-

कब तलक यूं ही जलाई जाएंगी
कागजी नोटों के बदले बेटियां


युवा कवि अदभुत के शब्दों में

वो घर आंगन को महकाती रचती सपनों का संसार
पर निष्ठुर समाज ने उसको दिया जन्म से पहले मार


डॉ सारस्वत मोहन मनीषी भ्रूणहत्या पर बहुत ही मार्मिक कविता में लिखते हैं-

मैं तेरे आंगन की तुलसी तेरे हाथ कटारी मां
जन्म पूर्व ही मार दिया क्यूं बोल अरी हत्यारी मां


आधुनिक कवियों ने नारी के एक अबला, बेबस और लाचार रूप को भी कविताओं में उकेरा है शायर गुलशन मदान लिखते हैं-

इक तवायफ पेट भरती है यहां
रोज अपनी बेबसी को बेचकर

डॉ रश्मि बजाज के शब्दों में-

बैठे हैं अब करते प्रतीक्षा/आएगा अवतार करेगा रक्षा/
हर गली हर कूँचे में/अपमानित द्रौपदी।


पुरूषोत्तम दास निर्मल आधुनिकता की दौड में नारी देह के दुरूपयोग पर व्यंग्य कसते हैं

औरत के साथ आदमी का देखिए सुलूक
ब्यूटी के नाम चीरहरण कर रहें हैं लोग


साहित्य ने केवल नारी पर हो रहे इन अत्याचारों को ही नहीं दिखाया अपितु नारी को जागृत एवं उत्साहित भी किया है ताकि वह न केवल स्वयम् पर हो रहे आघातों से बच सके एवं अपने ऊपर हुए जुल्मों का प्रतिशोध ले सके।

लोक कवि महेन्द्र सिंह बिलोटिया को इसका पूरा विश्वास भी है। वह लिखते हैं

काली बनकर जब कामिनी खंजर हाथ उठाएगी
दुर्गा रूप धरकर नारी दुष्टों से टकराएगी


कवि मक्खनलाल तंवर ने अत्याचारों के विरुद्ध नारी का आह्वान किया

खड्ग थाम अपने हाथों में महाकाली बनना होगा
अबला के अत्याचारी का शीश कलम करना होगा


नारी हर कठिन से कठिन वक्त में चट्टान बनकर खडी हो सकती है, नारी ने हर युग में ऐसे कार्य किए हैं जिनकी कल्पना करना भी दुष्कर है। इसका इतिहास गवाह है। प्रसिद्ध कवि हरिओम पंवार उस सैनिक की पत्नी को नमन करते हैं जिसने अपने शहीद पति की अर्थी को कंधा दिया था। समस्त विश्व के इतिहास में यह पहली घटना थी। उन्होने लिखा-

वो औरत पूरी पृथ्वी का बोझा सर ले सकती है
जो अपने पति की अर्थी को भी कंधा दे सकती है

नारी का चौथा रूप वो रूप है जिसकी साहित्य ने आलोचना की है। इस रूप में नारी उच्छृंखल है और उसने सामाजिक मर्यादाओं को तोडा है। साहित्य इस विषय पर भी अपनी पैनी नजर रखता है। कवि असलम इसहाक की दो क्षणिकाएं इसका प्रमाण हैं

नेताजी ने/ आधुनिक छात्रा की पोशाक देखकर कहा
विचार और वस्त्र /दोनों जरा ऊंचे हैं।


एवं

आधुनिक महिला ने सखी से
अपने पति का परिचय कराया
किचन के कोने में/जो लगा है धोने में/चाय का प्याला
सखी वही है मेरा घरवाला।

उपर्युक्त विश्लेषण वर्तमान हिन्दी पद्य साहित्य में नारी के कुछ पहलुओं को दिखाता है। बहुत सी सूक्ष्म बातें ऐसी भी होती हैं कि कई बार किसी सीमा के कारण साहित्यकार जिन्हें नहीं छू पाता। फिर भी यह विश्लेषण एक बात तो सिद्ध करता ही है कि वर्तमान कवि जागरूक है और समाज के लिए अपने योगदान का उत्तरदायी भी। नारी के चाहे कितने ही रूप हों या रहे हों परंतु उसकी असीम शक्ति ने समाज को सदैव एक नई दिशा देने का कार्य किया है। जिसके कारण वह सदा ही वंदनीय रही है और रहेगी। और वर्तमान साहित्य भी इस तथ्य को स्वीकार करता है।

Thursday, 4 September 2008

एक आम हिन्दुस्तानी की आवाज : दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

दुष्यन्त कुमार हिन्दी कवियों में एक ऐसा नाम है जिसे हिन्दी ग़ज़ल का प्रवर्तक माना जाता है। दुष्यन्त कुमार के विषय में अगर कहा जाए कि उन्होने हिन्दी रचनाकारों के लिए हिन्दी में ग़ज़ल का एक रास्ता खोला तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैसे हिन्दी ग़ज़ल की एक सामान्य परिभाषा देना कठिन कार्य है। क्योंकि यदि छंद के दृष्टिकोण से देखें तो हिन्दी ग़ज़ल में हिन्दी छंद का प्रयोग एवं हिन्दी छंद शास्त्र के नियमों का पालन होना चाहिए, अर्थात् मात्राओं की गणना ध्वनि के आधार पर नहीं अपितु प्रयोग किए गए शब्द के वास्तविक वजन के आधार पर होनी चाहिए। और यदि भाषा एवं शब्द चयन कि दृष्टि से देखें तो हिन्दी शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों का गहन अध्ययन किया जाए तो उन्होने उपर्युक्त दोनों नियमों का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया। उन्होंने अपनी ग़ज़लें उर्दू बहरों में लिखी और हिन्दी शब्दों के साथ उर्दू शब्दों का भी जमकर प्रयोग किया। परंतु इस सब के बाद दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों का महत्व कम नहीं हो जाता। एक आम आदमी की जुबान बनकर दुष्यन्त ने जिस पीड़ा को कलमबद्ध किया वह कोई आसान काम नहीं था। भाषा के बारे में वो कितने ईमानदार थे यह तो उनकी साए में धूप पर लिखी भूमिका से ही पता चलता है। उन्होने स्पष्ट किया मैं उस भाषा में लिखता हूं जिसे मैं बोलता हूं, जब हिन्दी और उर्दू अपने अपने सिहांसन से उतरकर आम आदमी के पास आती हैं तो इनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें पढ़कर ऐसा लगता है कि वो हिन्दी से कहीं ज्यादा हिन्दुस्तान की ग़ज़लें है। जिनमें उस समय के आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष, एवं परिस्थितियों से जूझते रहने का चित्रण किया है। अपने अशआर में बारूद भरकर दुष्यन्त कुमार ने शायरी के एक ऐसे स्वरूप को दिखाया जिससे हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल का एक नया रूप प्रकट हुआ। जिसे कहीं लचर छंद विधान के आधार पर अस्वीकार किया गया तो कहीं उसकी बेबाकी को सलाम ठोंका गया। लेकिन दुष्यन्त कहीं किसी भी आलोचना की परवाह नहीं की उनका सारा संघर्ष उनकी शायरी में प्रतिबिंबित हुआ है वो एक जगह लिखते हैं

कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिराहने लगा के बैठ गए

वह बेबसी एवं अभाव को भी आशावादी स्वर देते हैं

न होगा कमीज तो पावों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं सफर के लिए

उनकी पीड़ा में हर किसी की पीड़ा झलकती है। झूठ फरेब, धोखाधड़ी, भौतिकवाद को उन्होने अपनी ग़ज़लों में अनेक जगह प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। जिसके कुछ सटीक उदाहरण हैं ये शेर

जरा सा तौर तरीकों में हेर फेर करो,
तुम्हारे हाथ में कॉलर हो आस्तीन नहीं

परंतु दुष्यन्त कुमार का मुख्य स्वर दहशत से भरे समाज का चित्रांकन करना रहा उन्हें आजादी की वो आबो हवा रास नहीं आई. बहुत गुस्से में उन्होंने लिखा

यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा
इस शहर में अब कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

दुष्यन्त देश की तत्कालीन परिस्थितियों से बहुत नाराज थे। और यह बात उन्होने प्रखर स्वर में कही

आप आएं बडे शौक से आएं यहां
ये मुल्क देखने लायक तो है हसीन नहीं
कल नुमाइश में मिला वो चीथडे पहने हुए
मैने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

दुष्यन्त कुमार ने ऐसी ही स्थितियों का आईना बनने की हमेशा कोशिश भी की और अपने अक्खड़पन को मूर्त रूप भी दिया। उनकी नाराजगी इन शेरों में स्पष्ट जाहिर होती है

हालाते जिस्म सूरते जां और भी खराब
चारों तरफ खराब यहां और भी खराब
खंडहर बचे हुए हैं इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही

एक शायर के रूप में दुष्यन्त अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे समाज को जागृति प्रदान करने के लिए भी उनकी लेखनी सदैव ज्वलन शील रही। उन्होने भले ही निराशा एवं क्रोध का अधिकाधिक चित्रण किया लेकिन अंतत: उनका स्वर आशावादी ही रहा। यह उनकी हुंकार थी

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

दरख्तों के साए में भी धूप झेलते हुए दुष्यन्त कुमार ने हर तरह का कटु सत्य जनमानस में प्रवाहित किया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसा अद्भुत शायर न तो कभी हुआ और भविष्य में शायद ही कभी हो। हिन्दी कविताओं में कबीर के बाद इतना अक्खड़पन केवल दुष्यन्त कुमार की ही रचनाओं में उभरकर सामने आया। दुष्यन्त का अंदाजे बयां सबसे जुदा था। वास्तव में यह हिन्दी पाठकों का सौभाग्य है कि उन्हें दुष्यन्त को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी समस्त साहित्यिक सोच एवं संघर्ष शायद इसी शेर से प्रकट होता है।

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा जरूर
हर हथेली खून से तर और ज्यादा बेकरार

आइए इसी असर के लिए दुआ करें हम भी, दुष्यन्त को नमन करते हुए।