नए नए Accounting के प्राध्यापक
स्वयं के प्यार में हिसाब किताब भर बैठे
और उसी से प्रभावित होकर ये गलती कर बैठे
की सारा का सारा मसाला
दिल की बजाय, दिमाग से निकाला
और ये पत्र लिख डाला
लिखा था -
प्रिय ! मैं जब भी तुमसे मिलता हूँ "Share Premium" की तरह खिलता हूँ
सचमुच तुमसे मिलकर यूँ लगता है
गुलशन में नया फूल खिल गया
या यूँ कहूं, किसी उलझे हुए सवाल की "Balance Sheet" का "Total" मिल गया
मेरी जान जब तुम शरमाती हो
तो मुझे "Profit & Loss" के "Credit Balance" सी नजर आती हो
तुम्हारा वो "Income Tax Officer" भाई जो "31 st March" की तरह आता है
मुझे बिलकुल नहीं भाता है
उसकी शादी करवाकर घर बसवाओ
वर्ना घिस-घिस कर इतना पछतायेगा
एक दिन "Bad Debt" हो जाएगा
और कुछ मुझे भी संभालो "Fixed Asset" तरह जिन्दगी में ढालो
अपने "Scrap Value" के नजदीक आते माँ बाप को समझाओ
किसी तरह भी मुझे उनसे मिलवाओ
उन्हें कहो तुम्हे किस बात का रोना है
तुम्हारा दामाद तो खरा सोना है
और तुम्हारा पडोसी पहलवान जो बेवक्त हिनहिनाता है
उसे कहो मुझे "Live Stock Account" बनाना भी आता है
"Higher Accountancy" की किताब की तरह मोटी
और उसके अक्षरों की तरह काली
वो मेरी होने वाली साली जब भी मुस्कुराती है
मुझे "Risky Investment" पर "Interest Rate" सी नजर आती है
सच में प्रिय दिल में गहराई तक उतर जाती हो
जब तुम "Suspense Account" की तरह मेरे सपनों में आती हो
ये पत्र नहीं मेरी धड़कने तुम्हारे साथ में हैं
अब मेरे प्यार का "Debit-Credit" तुम्हारे हाथ में है
ये यादें और ख्वाब जब मदमाते हैं
तो जिन्दगी के "Trial Balance" बड़ी मुश्किल से संतुलन में आते हैं
जानता हूँ मुझसे दूर रहकर तुम्हारा दिल भी कुछ कहता है
मेरे हर आँसू का हिसाब तुम्हारी "Cash Book" में रहता है
और गिले शिकवे तो हम उस दिन मिटायेंगे
जिस दिन प्यार का "Reconcilation Statement" बनायेंगे
और हाँ ! तुम मुझे यूँ ही लगती हो सही
तुम्हे किसी "Window Dressing" की जरूरत नहीं
मुझे लगता है तुम्हारा जहन किसी और आशा में होगा
"Auditing" सीख रहा हूँ,
अगला ख़त और भी सरल भाषा में होगा
मैंने "Slip System" की पद्धति दिमाग में भर ली है
और तुम्हारे कॉलेज टाइम में लिखे एक सो पच्चीस लव लेटर्स की "Auditing" शुरू कर दी है
अब समझी !
मैं तुम्हारी जुदाई से "Insolvancy" की तरह डरता हूँ
मेरी जान मैं तुम्हे "Bonus Shares" से भी ज्यादा प्यार करता हूँ
तुम्हारी यादों में मदहोश होकर जब भी "Board" पर लिखने के लिए "Chalk" उठाता हूँ
"Ledger Performa" की जगह तुम्हारी तस्वीर बना आता हूँ
मैं तुम्हारे अन्दर अब इतना खो गया हूँ "Non Performing Asset" हो गया हूँ
अब पत्र बंद करता हूँ कुछ गलत हो तो "अपवाद के सिद्धांत" को अपनाना
कुछ नाजायज़ हो तो "Money Measurement Concept" से परे समझकर भूल जाना
"Consistency" ही जीवन का आधार होता है
और जिन्दा वही रहते हैं जिन्हें किसी से प्यार होता है
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Thursday, 17 September 2009
Friday, 13 March 2009
माटी मेरे देश
शत्रुओं को सदा मुँहतोड़ देती है जवाब
किन्तु मित्र की है मित्र माटी मेरे देश
की भारत की रक्षा करें मौत से कभी न डरें
ऐसे देती है चरित्र माटी मेरे देश की
शौर्य की भी जननी है शान्ति की भी अग्रदूत
सचमुच है विचित्र माटी मेरे देश की
सीने से लगाओ चाहो माथे से करो तिलक
चंदन से भी पवित्र माटी मेरे देश की
माँ समान ममता की छाँव देती है सभी को
बांटती असीम प्यार माटी मेरे देश की
अन्नपूर्णा समान आशीषों से पालती है
स्नेह का है पारावार माटी मेरे देश की
वीरता अखंड बुद्धि बल में प्रचंड और
पापियों पे है प्रहार माटी मेरे देश की
दुष्ट का दमन करे वीरों का सृजन करे
शक्ति स्रोत है अपार माटी मेरे देश की
क्रूर पापी देशद्रोहियों के बाजू बढ़ रहे
सह रही अत्याचार माटी मेरे देश की
काल सम झेलती है देखो आज दिन रात
बम गोली तलवार माटी मेरे देश की
अपनों की गद्दारी से हुई बेबसी में सुनो
युगों युगों से शिकार माटी मेरे देश की
शूरवीरों आगे आओ दुःख धरा का मिटाओ
आज करती पुकार माटी मेरे देश की
अरुण 'अद्भुत'
किन्तु मित्र की है मित्र माटी मेरे देश
की भारत की रक्षा करें मौत से कभी न डरें
ऐसे देती है चरित्र माटी मेरे देश की
शौर्य की भी जननी है शान्ति की भी अग्रदूत
सचमुच है विचित्र माटी मेरे देश की
सीने से लगाओ चाहो माथे से करो तिलक
चंदन से भी पवित्र माटी मेरे देश की
माँ समान ममता की छाँव देती है सभी को
बांटती असीम प्यार माटी मेरे देश की
अन्नपूर्णा समान आशीषों से पालती है
स्नेह का है पारावार माटी मेरे देश की
वीरता अखंड बुद्धि बल में प्रचंड और
पापियों पे है प्रहार माटी मेरे देश की
दुष्ट का दमन करे वीरों का सृजन करे
शक्ति स्रोत है अपार माटी मेरे देश की
क्रूर पापी देशद्रोहियों के बाजू बढ़ रहे
सह रही अत्याचार माटी मेरे देश की
काल सम झेलती है देखो आज दिन रात
बम गोली तलवार माटी मेरे देश की
अपनों की गद्दारी से हुई बेबसी में सुनो
युगों युगों से शिकार माटी मेरे देश की
शूरवीरों आगे आओ दुःख धरा का मिटाओ
आज करती पुकार माटी मेरे देश की
अरुण 'अद्भुत'
Monday, 1 September 2008
मुक्ति
मेरी मेज पर रखा था
एक गुलदस्ता एक दिन उसका किनारा
जरा सा टूट गया
सामने रखे उस गुलदस्ते का वह टूटा हुआ किनारा
मुझे चुभने लगा
वह चुभा
एक दिन
दो दिन
तीन दिन
और फ़िर मैंने हटा दिया
उस गुलदस्ते को अपनी मेज से
क्योंकि मैं कभी नहीं रखता
टूटी हुई चीजें
और
अधूरे सम्बन्ध
एक गुलदस्ता एक दिन उसका किनारा
जरा सा टूट गया
सामने रखे उस गुलदस्ते का वह टूटा हुआ किनारा
मुझे चुभने लगा
वह चुभा
एक दिन
दो दिन
तीन दिन
और फ़िर मैंने हटा दिया
उस गुलदस्ते को अपनी मेज से
क्योंकि मैं कभी नहीं रखता
टूटी हुई चीजें
और
अधूरे सम्बन्ध
Friday, 8 August 2008
माँ
माँ.......
कोई शिकायत नहीं है तुमसे मुझे
कि तुमने मुझे गर्भ में ही मार दिया
तुम तो मजबूर थी नाकितनी कोशिश की तुमने
लेकिन मुझे बचा नहीं पाई
पर मुझे कोई शिकायत नहीं है तुमसे
तुम तो यूं ही उदास हो
कोई पाप नहीं किया है तुमने
अरे मुझे जन्म ही तो नहीं लेने दिया न
मैं करती भी क्या जन्म लेकर
न तो थाली ही बजती मेरे जन्म पर
और ना ही बांटी जाती मिठाइयाँ
माँ
तुम रो क्यों रही हो
मैं तो समर्थन ही कर रही हूँ
तुम्हारे उस निर्णय का
जब तुमने दुःख के असीम पारावार से निकलकर
पापा को न केवल सांत्वना दी थी
बल्कि वादा भी किया था मुझे गर्भ मे ही ख़त्म कर देने का
माँतुम्हारा क्या कसूर है
तुम तो मजबूर थी ना
तुम नहीं विरोध नहीं कर सकती थी
दादी के आकांक्षा और पापा की आदेशनुमा अनुरोध का
और ......और .....हाँ
तुम सहन नहीं कर सकती थी .....पड़ोस की औरतों के ताने
तुमने मुझे जन्म लेने से रोककर
रोक लिया
अपनी हर भावी पीड़ा और आंसुओं की संभावना को
और हाँ माँ मुझे जन्म न देने के जो दावे किए गए थे
वो सब भी तो ठीक ही थे
ठीक ही तो कहा था पापा ने
प्रेमचंद के गोदान का वो अंश
"चारा खली पर पहला हक बैलों का है
बचे सो गायों का"
क्या तुम चाहोगी की तुम्हारी बेटी को निम्नता का अहसास हो
वो हमारे बेटे की अपेक्षा दबकर जीवन जिए
उसकी हर इच्छा हमारे लिए गौण हो
नहीं नातो फिर उसे जन्म मत दो
और मेरी माँतुम तो सबसे ही आगे निकल गई
रूह कांप उठती है
जब याद करती हूँ तुम्हारे वो घटिया मानसिक मंथन से निकले हुए दावे
इसी तरह समझाया था ना तुम्हें ख़ुद को
"बेटी तो जन्म से कष्ट हैहर असहनीय सहन करना पड़ता है
एक बेटी के लिए
वो पराया धन हैं
फिर भी
उसे पढ़ना लिखना पड़ेगा
वो सब उसके लिए किस काम का
वो बड़ी होगी तो समाज की गन्दी निगाहें उसे जीने नहीं देंगी
और शादी, दहेज़ की कल्पना से ही कोई भी कांप उठता है
और कहीं किसी से प्यार कर बैठेगी तो............
जीना, मरने से भी दूभर हो जायेगा
न जाने क्या हो वक्त बहुत ख़राब है
लड़की अगर हाथ से निकल जाए तो कहीं भी जा सकती है ................
वहां भी ........................नहीं नहीं ...............
इससे तो अच्छा है मैं उसे जन्म ही ना दूँ
"वाह माँ
कम से कम एक बार इतना तो सोचा होता
क्या बेटी को पढ़ाने से माँ-बाप कंगाल हो जाते हैं
क्या इस समाज में कोई नहीं मिलता बिना दहेज़ तुम्हारी बेटी का हाथ थामने वाला
क्या तुम्हे बिल्कुल भी यकीन नहीं था अपनी परवरिश पर
ज़रा बताओ मुझे
क्या सभी लड़कियां बन जाती हैं वेश्याएं .......................
सच तो ये है माँ कि तुमने खून किया है मेरा
ख़ुद को बचाने के लिए बलि चढ़ा दिया तुमने मुझे
सूख गई तुम्हारी ममता और ख़त्म हो गया तुम्हारा वात्सल्य
चंद घटिया और खोखले दावों के सामने
अरे किसने दिया तुम्हें
माँ कहलाने का हक
इससे तो अच्छा होता की तुम मुझे जन्म देती
और गला घोंटकर मार देती
कम से कम इसी बहाने ये अभागिन
स्पर्श तो पा जाती तुम्हारे हाथों का..................
पर तुमने तो मुझे एक अवसर भी नहीं दिया
सुना है माँ ... अस्पताल के पीछे जहाँ दफनाया गया था मुझे
वहां उग आया है एक नन्हा सा पौधा
कभी फुरसत मिले तो कड़कती बेरहम धूप में
मुझे अपने आँचल की छाँव देने आ जाना .........
बस माँ यही कहना था तुमसे ............
और हाँ
अब अपने आँसू पोंछ दो ........
भैया के स्कूल से आने को समय हो गया.......
कोई शिकायत नहीं है तुमसे मुझे
कि तुमने मुझे गर्भ में ही मार दिया
तुम तो मजबूर थी नाकितनी कोशिश की तुमने
लेकिन मुझे बचा नहीं पाई
पर मुझे कोई शिकायत नहीं है तुमसे
तुम तो यूं ही उदास हो
कोई पाप नहीं किया है तुमने
अरे मुझे जन्म ही तो नहीं लेने दिया न
मैं करती भी क्या जन्म लेकर
न तो थाली ही बजती मेरे जन्म पर
और ना ही बांटी जाती मिठाइयाँ
माँ
तुम रो क्यों रही हो
मैं तो समर्थन ही कर रही हूँ
तुम्हारे उस निर्णय का
जब तुमने दुःख के असीम पारावार से निकलकर
पापा को न केवल सांत्वना दी थी
बल्कि वादा भी किया था मुझे गर्भ मे ही ख़त्म कर देने का
माँतुम्हारा क्या कसूर है
तुम तो मजबूर थी ना
तुम नहीं विरोध नहीं कर सकती थी
दादी के आकांक्षा और पापा की आदेशनुमा अनुरोध का
और ......और .....हाँ
तुम सहन नहीं कर सकती थी .....पड़ोस की औरतों के ताने
तुमने मुझे जन्म लेने से रोककर
रोक लिया
अपनी हर भावी पीड़ा और आंसुओं की संभावना को
और हाँ माँ मुझे जन्म न देने के जो दावे किए गए थे
वो सब भी तो ठीक ही थे
ठीक ही तो कहा था पापा ने
प्रेमचंद के गोदान का वो अंश
"चारा खली पर पहला हक बैलों का है
बचे सो गायों का"
क्या तुम चाहोगी की तुम्हारी बेटी को निम्नता का अहसास हो
वो हमारे बेटे की अपेक्षा दबकर जीवन जिए
उसकी हर इच्छा हमारे लिए गौण हो
नहीं नातो फिर उसे जन्म मत दो
और मेरी माँतुम तो सबसे ही आगे निकल गई
रूह कांप उठती है
जब याद करती हूँ तुम्हारे वो घटिया मानसिक मंथन से निकले हुए दावे
इसी तरह समझाया था ना तुम्हें ख़ुद को
"बेटी तो जन्म से कष्ट हैहर असहनीय सहन करना पड़ता है
एक बेटी के लिए
वो पराया धन हैं
फिर भी
उसे पढ़ना लिखना पड़ेगा
वो सब उसके लिए किस काम का
वो बड़ी होगी तो समाज की गन्दी निगाहें उसे जीने नहीं देंगी
और शादी, दहेज़ की कल्पना से ही कोई भी कांप उठता है
और कहीं किसी से प्यार कर बैठेगी तो............
जीना, मरने से भी दूभर हो जायेगा
न जाने क्या हो वक्त बहुत ख़राब है
लड़की अगर हाथ से निकल जाए तो कहीं भी जा सकती है ................
वहां भी ........................नहीं नहीं ...............
इससे तो अच्छा है मैं उसे जन्म ही ना दूँ
"वाह माँ
कम से कम एक बार इतना तो सोचा होता
क्या बेटी को पढ़ाने से माँ-बाप कंगाल हो जाते हैं
क्या इस समाज में कोई नहीं मिलता बिना दहेज़ तुम्हारी बेटी का हाथ थामने वाला
क्या तुम्हे बिल्कुल भी यकीन नहीं था अपनी परवरिश पर
ज़रा बताओ मुझे
क्या सभी लड़कियां बन जाती हैं वेश्याएं .......................
सच तो ये है माँ कि तुमने खून किया है मेरा
ख़ुद को बचाने के लिए बलि चढ़ा दिया तुमने मुझे
सूख गई तुम्हारी ममता और ख़त्म हो गया तुम्हारा वात्सल्य
चंद घटिया और खोखले दावों के सामने
अरे किसने दिया तुम्हें
माँ कहलाने का हक
इससे तो अच्छा होता की तुम मुझे जन्म देती
और गला घोंटकर मार देती
कम से कम इसी बहाने ये अभागिन
स्पर्श तो पा जाती तुम्हारे हाथों का..................
पर तुमने तो मुझे एक अवसर भी नहीं दिया
सुना है माँ ... अस्पताल के पीछे जहाँ दफनाया गया था मुझे
वहां उग आया है एक नन्हा सा पौधा
कभी फुरसत मिले तो कड़कती बेरहम धूप में
मुझे अपने आँचल की छाँव देने आ जाना .........
बस माँ यही कहना था तुमसे ............
और हाँ
अब अपने आँसू पोंछ दो ........
भैया के स्कूल से आने को समय हो गया.......
जो सींच गए खूं से धरती
मेरे भारत की आजादी, जिनकी बेमौल निशानी है।
जो सींच गए खूं से धरती, इक उनकी अमर कहानी है।
वो स्वतंत्रता के अग्रदूत, बन दीप सहारा देते थे।
खुद अपने घर को जला-जला, मां को उजियारा देते थे।
उनके शोणित की बूंद-बूंद, इस धरती पर बलिहारी थी।
हर तूफानी ताकत उनके, पौरुष के आगे हारी थी।
मॉ की खातिर लडते-लडते, जब उनकी सांसें सोई थी।
चूमा था फॉंसी का फंदा, तब मृत्यु बिलखकर रोई थी।
ना रोक सके अंग्रेज कभी, आंधी उस वीर जवानी की।
है कौन कलम जो लिख सकती, गाथा उनकी कुर्बानी की।
पर आज सिसकती भारत मां, नेताओं के देखे लक्षण।
जिसकी छाती से दूध पिया, वो उसका तन करते भक्षण।
जब जनता बिलख रही होती, ये चादर ताने सोते हैं।
फिर निकल रात के साए में, ये खूनी खंजर बोते हैं।
अब कौन बचाए फूलों को, गुलशन को माली लूट रहा।
रिश्वत लेते जिसको पकड़ा, वो रिश्वत देकर छूट रहा।
डाकू भी अब लड़कर चुनाव, संसद तक में आ जाते हैं।
हर मर्यादा को छिन्न भिन्न, कुछ मिनटों में कर जाते हैं।
यह राष्ट्र अटल, रवि सा उज्ज्वल, तेजोमय, सारा विश्व कहे।
पर इसको सत्ता के दलाल, तम के हाथों में बेच रहे।
ये भला देश का करते हैं, तो सिर्फ कागजी कामों में।
भूखे पेटों को अन्न नहीं ये सडा रहे गोदामो में।
अपनी काली करतूतों से, बेइज्जत देश कराया है।
मेरे इस प्यारे भारत का, दुनिया में शीश झुकाया है।
पूछो उनसे जाकर क्यों है, हर द्वार-द्वार पर दानवता।
निष्कंटक घूमें हत्यारे, है ज़ार-ज़ार क्यों मानवता।
खुद अपने ही दुष्कर्मों पर, घडियाली आंसू टपकाते।
ये अमर शहीदों को भी अब, संसद में गाली दे जाते।
खा गए देश को लूट-लूट, भर लिया ज़ेब में लोकतंत्र।
इन भ्रष्टाचारी दुष्टों का, है पाप यज्ञ और लूट मंत्र।
गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, देखो छाई ये वीरानी।
अशफाक, भगत, बिस्मिल तुमको, फिर याद करें हिन्दुस्तानी।
है कहॉं वीर आजाद, और वो खुदीराम सा बलिदानी।
जब लालबहादुर याद करूं, आंखों में भर आता पानी।
जब नमन शहीदों को करता, तब रक्त हिलोरें लेता है।
भारत मां की पीड़ा का स्वर, फिर आज चुनौती देता है।
अब निर्णय बहुत लाजमी है, मत शब्दों में धिक्कारो।
सारे भ्रष्टों को चुन-चुन कर, चौराहों पर गोली मारो।
हो अपने हाथों परिवर्तन, तन में शोणित का ज्वार उठे।
विप्लव का फिर हो शंखनाद, अगणित योद्धा ललकार उठें।
मैं खड़ा विश्वगुरु की रज पर, पीड़ा को छंद बनाता हूं।
यह परिवर्तन का क्रांति गीत, मां का चारण बन गाता हूं।
जो सींच गए खूं से धरती, इक उनकी अमर कहानी है।
वो स्वतंत्रता के अग्रदूत, बन दीप सहारा देते थे।
खुद अपने घर को जला-जला, मां को उजियारा देते थे।
उनके शोणित की बूंद-बूंद, इस धरती पर बलिहारी थी।
हर तूफानी ताकत उनके, पौरुष के आगे हारी थी।
मॉ की खातिर लडते-लडते, जब उनकी सांसें सोई थी।
चूमा था फॉंसी का फंदा, तब मृत्यु बिलखकर रोई थी।
ना रोक सके अंग्रेज कभी, आंधी उस वीर जवानी की।
है कौन कलम जो लिख सकती, गाथा उनकी कुर्बानी की।
पर आज सिसकती भारत मां, नेताओं के देखे लक्षण।
जिसकी छाती से दूध पिया, वो उसका तन करते भक्षण।
जब जनता बिलख रही होती, ये चादर ताने सोते हैं।
फिर निकल रात के साए में, ये खूनी खंजर बोते हैं।
अब कौन बचाए फूलों को, गुलशन को माली लूट रहा।
रिश्वत लेते जिसको पकड़ा, वो रिश्वत देकर छूट रहा।
डाकू भी अब लड़कर चुनाव, संसद तक में आ जाते हैं।
हर मर्यादा को छिन्न भिन्न, कुछ मिनटों में कर जाते हैं।
यह राष्ट्र अटल, रवि सा उज्ज्वल, तेजोमय, सारा विश्व कहे।
पर इसको सत्ता के दलाल, तम के हाथों में बेच रहे।
ये भला देश का करते हैं, तो सिर्फ कागजी कामों में।
भूखे पेटों को अन्न नहीं ये सडा रहे गोदामो में।
अपनी काली करतूतों से, बेइज्जत देश कराया है।
मेरे इस प्यारे भारत का, दुनिया में शीश झुकाया है।
पूछो उनसे जाकर क्यों है, हर द्वार-द्वार पर दानवता।
निष्कंटक घूमें हत्यारे, है ज़ार-ज़ार क्यों मानवता।
खुद अपने ही दुष्कर्मों पर, घडियाली आंसू टपकाते।
ये अमर शहीदों को भी अब, संसद में गाली दे जाते।
खा गए देश को लूट-लूट, भर लिया ज़ेब में लोकतंत्र।
इन भ्रष्टाचारी दुष्टों का, है पाप यज्ञ और लूट मंत्र।
गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, देखो छाई ये वीरानी।
अशफाक, भगत, बिस्मिल तुमको, फिर याद करें हिन्दुस्तानी।
है कहॉं वीर आजाद, और वो खुदीराम सा बलिदानी।
जब लालबहादुर याद करूं, आंखों में भर आता पानी।
जब नमन शहीदों को करता, तब रक्त हिलोरें लेता है।
भारत मां की पीड़ा का स्वर, फिर आज चुनौती देता है।
अब निर्णय बहुत लाजमी है, मत शब्दों में धिक्कारो।
सारे भ्रष्टों को चुन-चुन कर, चौराहों पर गोली मारो।
हो अपने हाथों परिवर्तन, तन में शोणित का ज्वार उठे।
विप्लव का फिर हो शंखनाद, अगणित योद्धा ललकार उठें।
मैं खड़ा विश्वगुरु की रज पर, पीड़ा को छंद बनाता हूं।
यह परिवर्तन का क्रांति गीत, मां का चारण बन गाता हूं।
Wednesday, 28 May 2008
माँ वाणी को नमन ...........
कर वीणा से सजे हैं शोभित हैं शुभ्र पट
अतिशय अकराल हिम सम हार से
गीत छंद नवरस सरस हों आभरण
पद्य मोद से भरे हों कुमुद बाहर से
कविता मे नव गति नव हो प्रकाश अब
मुक्त करो शारदे माँ जग अंधकार से
वेद विद्याओं की देवी कोटी कोटी नमन है
अदभुत ज्ञान दो माँ असह दुलार से
अतिशय अकराल हिम सम हार से
गीत छंद नवरस सरस हों आभरण
पद्य मोद से भरे हों कुमुद बाहर से
कविता मे नव गति नव हो प्रकाश अब
मुक्त करो शारदे माँ जग अंधकार से
वेद विद्याओं की देवी कोटी कोटी नमन है
अदभुत ज्ञान दो माँ असह दुलार से
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