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Friday, 12 August 2016

फितरत का डर

कुछ उसकी हिम्मत का डर

कुछ जग की सीरत का डर


कभी कभी नफ़रत का डर

और कभी उल्फत का डर


मुफलिस को बाज़ारों में

हर शय की कीमत का डर


सबसे ज्यादा होता है

इंसा को इज्ज़त का डर


नीड़ बनाने वालों को

दुनिया की आदत का डर


अद्भुत को सबसे ज्यादा

ख़ुद अपनी फितरत का डर

Saturday, 5 November 2011

वो अपने आंसुओं को घर से ही पीकर निकलता है

हमेशा वो मेरी उम्मीद से बढ़कर निकलता है
मेरा गम हर नए मौसम में कुछ बेहतर निकलता है

कहाँ ले जा के छोड़ेगा न जाने काफिला मुझको
जिसे रहबर समझता हूँ वही जोकर निकलता है

मेरे इन आंसुओं को देखकर हैरान क्यों हो तुम
मेरा ये दर्द का दरिया तो अब अक्सर निकलता है

तुझे मैं भूल जाने की करूं कोशिश भी तो कैसे
तेरा अहसास इस दिल को अभी छूकर निकलता है

अब उसकी बेबसी का मोल दुनिया क्या लगायेगी
वो अपने आंसुओं को घर से ही पीकर निकलता है

निकलता ही नहीं 'अद्भुत' किसी पर भी मेरा गुस्सा
मगर ख़ुद पर निकलता है तो फ़िर जी भर निकलता है

डॉ. अरुण मित्तल 'अद्भुत'

Wednesday, 12 November 2008

फितरत का डर

कुछ उसकी हिम्मत का डर
कुछ जग की सीरत का डर

कभी कभी नफ़रत का डर
और कभी उल्फत का डर

मुफलिस को बाज़ारों में
हर शय की कीमत का डर

सबसे ज्यादा होता है
इंसा को इज्ज़त का डर

नीड़ बनाने वालों को
दुनिया की आदत का डर

अद्भुत को सबसे ज्यादा
ख़ुद अपनी फितरत का डर